Thursday, 8 October 2015

चालाक महिला-NICE STORY

चालाक महिला


एक दिन एक औरत गोल्फ खेल रही थी| जब उसने बॉल को हिट किया तो वह जंगल में चली गई| जब वह बॉल को खोजने गई तो उसे एक मेंढक मिला जो जाल में फंसा हुआ था| मेंढक ने उससे कहा - "अगर तुम मुझे इससे आजाद कर दोगी तो मैं तुम्हें तीन वरदान दूँगा| "महिला ने उसे आजाद कर दिया... . . मेंढक ने कहा - "धन्यवाद, लेकिन तीन वरदानों में मेरी एक शर्त है जो भी तुम माँगोगी तुम्हारे पति को उससे दस गुना मिलेगा| . . महिला ने कहा - "ठीक है" उसने पहला वरदान मांगा कि मैं संसार की सबसे खुबसूरत स्त्री बनना चाहती हूँ| मेंढक ने उसे चेताया - "क्या तुम्हें पता है कि ये वरदान तुम्हारे पति को संसार का सबसे सुंदर व्यक्ति बना देगा| . . महिला बोली - "दैट्स ओके, क्योंकि मैं संसार की सबसे खुबसूरत स्त्री बन जाऊँगी और वो मुझे ही देखेगा..!" मेंढक ने कहा - "तथास्तु" . . अपने दूसरे वरदान में उसने कहा कि मैं संसार की सबसे धनी महिला बनना चाहती हूँ| . . मेंढक ने कहा - "यह तुम्हारे पति को विश्व का सबसे धनी पुरुष बना देगा और वो तुमसे दस गुना पैसे वाला होगा |" महिला ने कहा - "कोई बात नहीं| मेरा सब कुछ उसका है और उसका सब कुछ मेरा !" मेंढक ने कहा - "तथास्तु" जब मेंढक ने अंतिम वरदान के लिये कहा तो उसने अपने लिए एक "हल्का सा हर्ट अटैक मांगा|" . . मोरल ऑफ स्टोरीः महिलाएं बुद्धिमान होती हैं, उनसे बच के रहें ! . . . महिला पाठकों से निवेदन है आगे ना पढें, आपके लिये जोक यहीं खत्म हो गया है | यहीं रुक जाएँ और अच्छा महसूस करें ...!! . . पुरुष पाठकः कृपया आगे पढें| . . . उसके पति को उससे "10 गुना हल्का हार्ट अटैक" आया| मोरल ऑफ द स्टोरी : महिलाएं सोचती हैं वे वास्तव में बुद्धिमान हैं| उन्हें ऐसा सोचने दो, क्या फर्क पडता है|

मच्छर की कहानी

मच्छर की कहानी



क्या तुमको पता है कि केवल मादा मच्छर ही काटती हैं ? खून पीती हैं ? बहुत पहले की बात है। वियतनाम के एक गाँव में टॉम और उसकी पत्नी न्हाम रहते थे। टॉम खेती करता था और पत्नी रेशम के कीड़े पालती थी। टॉम बड़ा मेहनती था, पर न्हाम जिंदगी में तमाम ऐशो-आराम की आकांक्षी थी। एक दिन न्हाम एकाएक बीमार पड़ गई। टॉम उस वक्त खेतों में काम कर रहा था। जब वह घर लौटा, उसने पाया कि न्हाम अब इस दुनिया में नहीं है। टॉम घुटने टेककर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी उसे आकाशवाणी सुनाई दी कि वह समुद्र के बीच स्थित एक विशाल पहाड़ी पर न्हाम का शव ले जाए। कई दिनों की यात्रा के बाद टॉम न्हाम के शव के साथ उस पहाड़ी पर पहुँचा और एक खूबसूरत फूलों के बाग में ले जाकर शव को लिटा दिया। उसकी पलकें थकान से झपक ही रही थीं कि सहसा सफेद बालों तथा तारों-सी चमकती आँखोंवाले एक महापुरुष वहाँ प्रकट हुए। उन महापुरुष ने टॉम से कहा कि वह उनका शिष्य बनकर इसी जगह शांति से रहे। पर टॉम ने कहा कि वह अपनी पत्नी न्हाम को बेहद प्यार करता है और उसके बगैर रह नहीं सकता। महापुरुष टॉम की इच्छा जानकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि वह अपनी उँगली काटकर खून की तीन बूँदें न्हाम के शव पर चुआ दे। टॉम ने वैसा ही किया। तभी जादू-सा हुआ। खून की बूँदे पड़ते ही न्हाम उठ बैठी। तब महापुरुष ने न्हाम को चेतावनी दी कि अगर वह ईमानदार और मेहनती नहीं बनेगी तो उसे सजा भुगतनी पड़ेगी। यह कहकर वह महापुरुष वहाँ से अचानक गायब हो गए। टॉम और न्हाम नाव पर बैठकर चल दिए। रास्ते में एक गाँव के किनारे उन्होंने नाव रोकी। टॉम खाने-पीने का कुछ सामान खरीदने चला गया। नाव में बैठी न्हाम टॉम के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी एक विशाल सुसज्जित नाव उसके पास आई। उस नाव का मालिक एक अमीर था। उसने न्हाम को अपनी नाव पर आकर चाय पीने की दावत दी। चायपान खत्म हुआ तो अमीर ने न्हाम से उसकी खूबसूरती की प्रशंसा की और उससे शादी का प्रस्ताव रखा। यह भी वादा किया कि वह उसे अपने महल की एकमात्र रानी बनाकर रखेगा। न्हाम का तो सपना ही था कि वह धनी महिला बने, उसकी सेवा में ढेरों नौकर चाकर हों। वह चट से उस अमीर का प्रस्ताव मान बैठी। टॉम जब गाँव से चीजें खरीदकर लौटा तो एक बूढ़े नाविक ने उसे किस्सा सुनाया। टॉम न्हाम की धोखेबाजी से आगबबूला हो उठा। वह फौरन उस अमीर के घर की तरफ रवाना हुआ। कुछ ही दिनों में वह वहाँ जा पहुँचा। उसके महल में पहुँच उसने एक नौकर से प्रार्थना कि कि वह महल के मालिक से मिलना चाहता है। तभी अचानक न्हाम फूल तोड़ने के लिए बगीचे में आई और टॉम को वहाँ देख चकित रह गई। उसने टॉम से कहा कि वह यहाँ बेहद सुखी है और यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहती। टॉम ने कहा कि वह उसे कतई वापस नहीं ले जाना चाहता। वह तो अपने खून की तीन बूँदें वापस लेने आया है। वह न्हाम उसे लौटा दे। बस ! न्हाम इस बात से बेहद खुश हुई, ‘चलो खून की तीन बूँदें देकर ही छुटकारा मिल जाएगा।’ ऐसा कहकर उसने तुरंत अपनी एक उँगली में गुलाब का काँटा चुभोया और टॉम की बाँह पर खून टपकाने लगी। जैसे ही खून की तीसरी बूँद गिरी, न्हाम का शरीर सिकुड़ने लगा और वह मादा मच्छर के रूप में तब्दील हो गई। यही न्हाम की सजा थी। वह मादा मच्छर बनकर टॉम के सिर पर मँडराने लगी, जैसे भन्नाकर कह रही हो, ‘मुझे खून लौटा दो ! मैं माफी माँगती हूँ, मैं माफी माँगती हूँ !!’’ धोखाधड़ी हमें मौत की ओर ले जाती है।

उलटी गंगा

उलटी गंगा


एक बनिया था। भला था। भोला था। नीम पागल था। एक छोटी सी दुकान चलाता था, दाल, मुरमुरे, रेवड़ी जैसी चीजें बेचता था और शाम तक दाल-रोटी का जुगाड़ कर लेता था। एक रोज दुकान बंद कर देर रात वह अपने घर जा रहा था, तभी रास्ते में उसे कुछ चोर मिले। बनिये ने चोरों से पूछा, ‘‘इस वक्त अँधेरे में आप लोग कहाँ जा रहे हैं ?’’ चोर बोले, ‘‘भैया, हम तो सौदागर हैं। आप हमें क्यों टोक रहे हैं ?’’ बनिये ने कहा, ‘‘लेकिन एक पहर रात बीतने के बाद आप जा कहाँ रहे हैं ?’’ चोर बोले, ‘‘माल खरीदने।’’ बनिये ने पूछा, ‘‘माल नकद खरीदोगे या उधार ?’’ चोर बोले, ‘‘न नकद, न उधार। पैसे तो देने ही नहीं हैं।’’ बनिये ने कहा, ‘‘आपका यह पेशा तो बहुत बढ़िया है। क्या आप मुझे भी अपने साथ ले चलेंगे ?’’ चोर बोले, ‘‘चलिए। आपको फ़ायदा ही होगा।’’ बनिये ने कहा, ‘‘बात तो ठीक है। लेकिन पहले यह तो बताओ कि यह धंधा कैसे किया जाता है ?’’ चोर बोले, ‘‘लिखो—किसी के घर के पिछवाड़े...’’ बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’ चोर बोले, ‘‘चुपचाप सेंध लगाना...’’ बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’ चोर बोले, ‘‘फिर दबे पाँव घर में घुसना...’’ बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’ चोर बोले, ‘‘जो भी लेना हो, सो इकट्ठा करना...’’ बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’ चोर बोले, ‘‘न तो मकान मालिक से पूछना और न उसे पैसे देना...’’ बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’ चोर बोले, ‘‘जो भी माल मिले उसे लेकर घर लौट जाना।’’ बनिये ने सारी बातें कागज पर लिख लीं और लिखा हुआ कागज जेब में डाल लिया। बाद में सब चोरी करने निकले। चोर एक घर में चोरी करने घुसे और बनिया दूसरे घर में चोरी करने पहुँचा। वहाँ उसने ठीक वही किया जो कागज में लिखा था। पहले पिछवाड़े सेंध लगाई। दबे पाँव घर में घुसा। दियासलाई जलाकर दीया जलाया। एक बोरा खोजकर उसमें पीतल के छोटे बड़े बरतन बड़ी बेफ़िक्री से भरने लगा। तभी एक बड़ा तसला उसके हाथ से गिरा और सारा घर उसकी आवाज से गूँज उठा। घर के लोग जाग गए। सबने ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर बनिये को घेर लिया और उसे मारने-पीटने लगे। बनिये को ताज्जुब हुआ। मार खाते उसने अपनी जेब में रखा कागज निकाला और उसे एक नजर पढ़ डाला। फिर तो वह जोश में आ गया। जब सब लोग उसकी मरम्मत कर रहे थे, तब बनिया बोला— ‘‘भाइयों, यह तो लिखा-पढ़ी से बिलकुल उलटा हो रहा है। यहाँ तो उलटी गंगा बह रही है।’’ बनिये की बात सुनकर सब सोच में पड़ गए। मारना-पीटना रोककर सबने पूछा, ‘‘यह तुम क्या बक रहे हो ?’’ बनिये ने कहा, ‘‘लीजिए, यह कागज देख लीजिए। इसमें कहीं पिटाई का जिक्र है’’ ? घर के लोग तुरंत समझ गए। उन्होंने बनिये को घर से बाहर धकेल दिया। सोच-विचारकर किया कार्य कभी कष्टदायक नहीं होता है।

एक रुपया

एक रुपया
एक महात्मा भ्रमण करते हुए किसी नगर से होकर जा रहे थे । मार्ग में उन्हें एक रुपया (A rupee) मिला । महात्मा तो वैरागी और संतोष से भरे व्यक्ति थे भला एक रूपये (A rupee) का क्या करते इसलिए उन्होंने यह रुपया किसी दरिद्र को देने का विचार किया कई दिन की तलाश के बाद भी उन्हें कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला । एक दिन वो अपने दैनिक क्रियाकर्म के लिए सुबह सुबह उठते है तो क्या देखते है एक राजा अपनी सेना को लेकर दूसरे राज्य पर आक्रमण के लिए उनके आश्रम के सामने से सेना सहित जा रहा है । ऋषि बाहर को आये तो उन्हें देखकर राजा ने अपनी सेना को रुकने का आदेश दिया और खुद आशीर्वाद के लिए ऋषि के पास आकर बोले महात्मन मैं दूसरे राज्य को जीतने के लिए जा रहा हूँ ताकि मेरा राज्य विस्तार हो सके । इसलिए मुझे विजयी होने का आशीर्वाद प्रदान करें । इस पर ऋषि ने काफी देर सोचा और सोचने के बाद वो एक रुपया राजा की हथेली में रख दिया । यह देखकर राजा हेरान और नाराज दोनों हुए लेकिन उन्हें इसके पीछे का प्रयोजन काफी देर तक सोचने के बाद भी समझ नहीं आया । तो राजा ने महात्मा से इसका कारण पूछा तो महात्मा ने राजा को सहज भाव से जवाब दिया कि राजन कई दिनों पहले मुझे ये एक रुपया आश्रम आते समय मार्ग में मिला था तो मुझे लगा किसी दरिद्र को इसे दे देना चाहिए क्योंकि किसी वैरागी के पास इसके होने का कोई औचित्य नहीं है । बहुत खोजने के बाद भी मुझे कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला लेकिन आज तुम्हे देखकर ये ख्याल आया कि तुमसे दरिद्र तो कोई है ही नहीं इस राज्य में जो सब कुछ होने के बाद भी किसी दूसरे बड़े राज्य के लिए भी लालसा रखता है । यही एक कारण है कि मैंने तुम्हे ये एक रुपया दिया है । राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने युद्ध का विचार भी त्याग दिया ।

विद्या का सदुपयोग

विद्या का सदुपयोग

एक व्यक्ति पशु पक्षियों का व्यापार किया करता था | एक दिन उसे पता लगा कि उसके गुरु को पशु पक्षियों की बोली की समझ है | उसके मन में ये ख्याल आया कि कितना अच्छा हो अगर ये विद्या उसे भी मिल जाये तो उसके लिए भी यह फायदेमंद हो | वह पहुँच गया अपने गुरु के पास और उनकी खूब सेवा पानी की और उनसे ये विद्या सिखाने के लिए आग्रह किया | गुरु ने उसे वो विद्या सिखा तो दी लेकिन साथ ही उसे चेतावनी भी दी कि अपने लोभ के लिए वो इसका इस्तेमाल नहीं करें अन्यथा उसे इस कुफल भोगना पड़ेगा | व्यक्ति ने हामी भर दी | वो घर आया तो उसने अपने कबूतरों के जोड़े को यह कहते हुए सुना कि मालिक का घोडा दो दिन बाद मरने वाला है इस पर उसने अगले ही दिन घोड़े को अच्छे दाम पर बेच दिया | अब उसे भरोसा होने लगा कि पशु पक्षी एक दूसरे को अच्छे से जानते है | अगले दिन उसने अपने कुत्ते को यह कहते हुए सुना कि मालिक की मुर्गिया जल्दी ही मर जाएँगी तो उसने बाजार जाकर सारी मुर्गियों को अच्छे दामों पर बेच दिया | और कई दिनों बाद उसने सुना कि शहर की अधिकतर मुर्गियां किसी महामारी की वजह से मर चुकी है वो बड़ा खुश हुआ कि चलो मेरा नुकसान नहीं हुआ | हद तो तब हो गयी जब उसने एक दिन अपनी बिल्ली को यह कहते हुए सुना कि हमारा मालिक अब तो कुछ ही दिनों का मेहमान है तो उसे पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन बाद में अपने गधे को भी उसने वही बात दोहराते हुए सुना तो वो घबरा कर अपने गुरु के पास गया और उनसे बोला कि मेरे अंतिम क्षणों में करने योग्य कोई काम है तो बता दें क्योंकि मेरी मृत्यु निकट है | इस पर गुरु ने उसे डांटा और कहा कि मूर्ख मेने पहले ही तुझसे कहा था कि अपने हित के लिए इस विद्या का उपयोग मत करना क्योंकि सिद्धियाँ न किसी की हुई है और न किसी की होंगी | इसलिए मेने तुझसे कहा था कि अपने लाभ के लिए और किसी के नुकसान के लिए इनका प्रयोग मत करो |

दुष्ट प्रकृति के प्राणी को उसके किये की सज़ा अवश्य मिलती है

दुष्टता का फल
कंचनपुर के एक धनी व्यापारी के घर में रसोई में एक कबूतर ने घोंसला बना रखा था । किसी दिन एक लालची कौवा जो है वो उधर से आ निकला । वंहा मछली को देखकर उसके मुह में पानी आ गया । तब उसके मन में विचार आया कि मुझे इस रसोघर में घुसना चाहिए लेकिन कैसे घुसू ये सोचकर वो परेशान था तभी उसकी नजर वो कबूतरों के घोंसले पर पड़ी । उसने सोचा कि मैं अगर कबूतर से दोस्ती कर लूँ तो शायद मेरी बात बन जाएँ । कबूतर जब दाना चुगने के लिए बाहर निकलता है तो कौवा उसके साथ साथ निकलता है । थोड़ी देर बाद कबूतर ने पीछे मुड़कर देखता तो देखा कि कौवा उसके पीछे है इस पर कबूतर ने कौवे से कहा भाई तुम मेरे पीछे क्यों हो इस पर कौवे ने कबूतर से कहा कि तुम मुझे अच्छे लगते हो इसलिए मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ इस पर कौवे से कबूतर ने कहा कि हम कैसे दोस्त बन सकते है हमारा और तुम्हारा भोजन भी तो अलग अलग है मैं बीज खाता हूँ और तुम कीड़े । इस पर कौवे ने चापलूसी दिखाते हुए कहा “कौनसी बड़ी बात है मेरे पास घर नहीं है इसलिए हम साथ साथ तो रह ही सकते है है न और साथ ही भोजन खोजने आया करेंगे तुम अपना और मैं अपना ।” इस पर घर के मालिक ने देखा कि कबूतर के साथ एक कौवा भी है तो उसने सोचा कि चलो कबूतर का मित्र होगा इसलिए उसने उस बारे में अधिक नहीं सोचा । अगले दिन कबूतर खाना खोजने के लिए साथ चलने को कहता है तो कौवे ने पेट दर्द का बहाना बना कर मना कर दिया । इस पर कबूतर अकेला ही चला गया क्योंकि कौवे ने घर के मालिक को यह कहते हुए सुना था नौकर को कि आज कुछ मेहमान आ रहे है इसलिए तुम मछली बना लेना । उधर कौवा नौकर के रसोई से बाहर निकलने का इन्तजार ही कर रहा था कि उसके जाते ही कौवे ने थाली और झपटा और मछली उठाकर आराम से खाने लगा । नौकर जब वापिस आया तो कौवे को मछली खाते देख गुस्से से भर गया और उसने कौवे को पकड़ कर गर्दन मरोड़ कर मार डाला । जब शाम में कबूतर वापिस आया तो उसने कौवे की हालत देखी तो सारी बात समझ गया । इसलिए कहा गया है दुष्ट प्रकृति के प्राणी को उसके किये की सज़ा अवश्य मिलती है ।

लेखा जोखा

लेखा जोखा
एक बीहड़ वन में बहुत पुराना बरगद का एक पेड़ था |उस पेड़ की जताएं उतर कर यहाँ वहाँ पृथ्वी पर धस गईं थीं इन |प्राकृतिक स्तंभों पर पेड़ के पत्तों ने वितान सा तान दिया था |जिसके कारण वहाँ बहुत मनभावन सुहानी हरियाली छाई रहती थी |दूर दूर के बटोही वृक्ष की सघन छाया में घंटे दो घंटे विश्राम करके आगे बढ़ते थे | एक दिन एक थका हारा बटोही आया |उस बड़े पेड़ की शीतल छाया में लेटते ही उसे नींद आगई |उस बरगद की जड़ में से एक सर्प निकला और सरसराता हुआ सोते हुए बटोही के पास से निकल गया |उसके मुहं में कोई पीली सी चीज चमक रही थी शायद किसी धातु का टुकड़ा था | ज्यूं ही वह बटोही के पास से गुजरा बटोही की आँख खुल गयी |नाग को देख कर उसके प्राण सूख गए |वह बिना हिलेडुले लेता रहा |नाग देवता ने थोड़ी दूर जाकर अपने मुंह में से एक गोल चमकती हुई वस्तु धरती पर छोड़ दी और स्वयं अपनी बांबी में लौट गए | बटोही ने उत्सुकता वश जा कर देखा तो वह एक स्वर्ण मुद्रा थी |वह ओने स्थान पर बापिस आया और एक ऊंची डाल पर बैठ कर ध्यान से देखने लगा |कुछ समय बाद वह नाग फिर से अपने बिल से बाहर आया |उसके मुँह में वैसी ही स्वर्ण मुद्रा और थी |वह उसी स्थान पर आया और मुद्रा डाल कर चला गया |इस प्रकार दो सौ स्वर्ण मुद्राएं उसने अपने बिल के पास एकत्र कर दीं | बटोही चित्र लिखा सा यह व्यापार देखता रहा |इतने में दिन ढल गया औरअस्ताचलगामीसूर्य रश्मियां सारे वन्य प्रदेश पर छा गईं |उस सुनहरी आभा से वह स्वर्ण ढेर जगमगा उठा और बटोही की आँखें चौधिया गईं | जब वह बहुत देर तक फिर बाहर नहीं आया तो बटोही ने उनसब मुद्राओं को एक रूमाल में बाँध लिया और घर की ओर चल पड़ा |अब उसे यह चिंता सताने लगी कि इतनी बड़ी धनराशि ले कर वह जंगल का रास्ता कैसे तय करे |छोर डाकू उसे लूट लेगे तो वह क्या करेगा |तभी उसे एक पुराने परिचित की याद आई | वह पास ही के गाँव में रहता था |उसी के यहाँ रात बिताने का निश्चय किया | गृह स्वामी ने बटोही की बड़ी आवभगत की |भोजन के बाद पलंग बिछा दिया और सब सो गए |रात के अँधेरे में संशयात्मक बटोही की आँखों में नींद न थी वह अपनी पोटली की चिंता में लीन था |उसे व्याकुलता इस बात की थे कि कोई उसकी पोटली चुरा न ले ||वह धीरे से उठा और पास ही पड़ी तेल की हंडिया में वह मोहरों की पोटली डाल दीऔर चैन से सो गया | देव योग से अर्ध रात्रि को गृह स्वामीकी पुत्रवधू ने बालक को जन्म दिया |उपचार में तेल की आवश्यकता पड़ी तो तेल की वही हांडी अंदर लजाई गयी |जब तेल उडेला गया तो सामने मोहरों की वह पोटली आपदी और मोहरें बिखर गईं |आश्चर्यचकित ग्रिह्स्वामिनीं ने जाना कि यह बालक बहुत ही भाग्यशाली है |संपदा साथ लाया है |और भगवान को कोतिशय धन्यवाद दिया |फिर पोटली सम्हाल कर घर में रख दीऔर हांडी अपने पूर्व स्थान पर पहुंचा दी | प्रातः झुटपुटे में ही वह बटोही उठा और अपनी माया निकालने के उद्देश्य से हांडी टटोली |वह तो बिलकुल रीती पडी थी |वह किसी को कहता भी तो क्या उसने किसी को कुछ बताया तो था नहीं | वह कुछ सोच कर उसी बरगद के पेड़ के नीचे पहुंचा और धाड़ मार मार कर रोने लगा |वह कहने लगा "हे नाग देवता मैं अभागा था जो आपने दिया उसे सजा कर नहीं रख सका अब कृपा करो फिर से निहाल करदो | यह सुन कर नाग बिल से निकला और एक मुद्रा ला कर बाहर रख दी |थोड़ी देर बाद एक और मुद्रा ला कर वहाँ रख गया |और फिर बाहर नहीं निकला | लोभी बटोही चिरकाल तक वहाँ बैठा रहा ,रोता रहा और निहोरे करता रहा "दया करो नाग देवता दो सौ नहीं तो सौ ही कर दो अब ऐसी भूल कभी नहीं होगी "|किन्तु सब व्यर्थ गया इतने में बांबी में से गंभीर आवाज सुनाई दी "भोला प्राणी तू कितना सुखी था जब तक तूनें ये स्वर्ण मुद्राएं नहीं देखीं थीं किन्तु इन्हें पा कर तेरा चित्त कितना अशांत और विचलित हो गया है |यह संपदा अनर्थ की जड़ है तेरे मित्र के यहाँ जो बालक हुआ है उसका मैं दो सौ मुद्राओं का रिनी था |मैंने तेरे द्वारा उसकी संपत्ति उसके पास भिजवादी |ये मुद्राएं उसी के निमित्त थीं तू तो केवल साधन मात्र था |संसार का लेखा जोखा इसी भाँती पूरा होता रहता है |ये दो मुद्राएं तेरे लिएव हैं |बालक को जा कर उसकी थाथी उसे सूप देने का पारिश्रमिक है |केवल गाधी कमाई का ही पैसा फलता है पड़ा गिरा पाया माल किसी को नहीं फलता |इसी लिए धार लौट जाओ बटोही परिश्रम करके कमाओ और आनंद तथा ईमानदारी से जीवन निर्वाह करो "\ भय से चकित बटोही ने मुद्राएं अपने साफे में बाँध लीन और घर चला गया |
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